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Showing posts from 2019

मन की उदासी

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मन क्यों इस कदर उदास है , यह आदत है या, बात कुछ ख़ास है।  न जाने कैसा, अजीब सा एहसास है , और क्यों हो रहा यह आभास है।  नहीं आता मुझे कुछ भी रास है , अपना स्वभाव तो केवल मन का दास है।  क्या मुझसे दूर, क्या मेरे पास है , अपना हथियार तो केवल विश्वास है।  करता जब कोई निरंतर प्रयास है , बन जाता फिर वो काम, ख़ास है।  कैसा अनोखा यह जीवन का राज़ है , हर दिन ने छेड़ा एक नया साज़ है।  फिर भी मन में छुपी इक आस है , जो कहती है कि , डट कर चलना है जब तक इस शरीर में सांस है। 

बेबसी

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क्यों हो रही बेबसी है, चेहरे की मुस्कराहट, कहाँ जा छुपी है।  ऐसी चुभन मन में बसी है, मानो ज़िंदगी कहीं आ फसी है।  मन की दशा यह ताज़ी नहीं है, और सुनने को कोई राज़ी नहीं है।  यह ज़िंदगी क्यों ऐसे थमी है , आँखों में मेरी अब भी नमी है।  तमन्ना नहीं सितारों की, बस चाही कुछ ज़मीं है।  न जानू मैं की क्या सही है, पर मेरी मंज़िल यह तो नहीं है।  यह तो रास्ते में निकलती हुई एक झाँकी है, और मेरा मुक़ाम अभी बाकी है।  ऐ मंज़िल, कुछ तो बता तू और कितनी दूर है, दिल कबसे मेरा यूँ मजबूर है।  अब बुला भी ले, और सहा नहीं जाता, तुझसे दूर, अब मुझसे रहा नहीं जाता।  लगता है जैसे खुद को खो दिया है , न जाने कौन सा बीज बो दिया है।  इंतेज़ार नहीं मुझे फल का, बस इतना बता दे की रास्ता क्या है कल का।  कुछ तो दे तुझ तक पहुँचने के निशान , सब कुछ लग रहा है मुझे अब वीरान।  कब से हिम्मत को जुटा कर रखा है , मन को मैंने यह समझा कर रखा है।  कि  जल्द होगा यह पड़ाव भी पार, और खुल...

गुस्सा

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गुस्सा भी अजीब चीज़ है , बहुत सी नकारात्मकताओं का बीज है।   बैठ जाता है ऐसे नाक पर  , जैसे पक्षी कोई बैठा हो शाख पर ।  बार-बार दिमाग पर  ज़ोर देता है , मन की शांति को निचोड़ लेता है।  कठोर बनाता है यह हमारी वाणी , और कभी-कभी ले आता है आँखों में पानी। ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी इसको जताना , और मन की अवस्था को सामने दिखाना।  पर जब इससे इंसान होश खो देता है , तब अपने रिश्तों को दुःख में भिगो देता है।  चलाने लगता है फिर इंसान शब्दों के बाण , और बिखर कर रह जाता है, सारा मान सम्मान।  बिना सोचे समझे इंसान जो बोल देता है , सामने वाला उसे वैसे ही तोल लेता है।  यूँ तो समय भर देता है शरीर के घाव , पर शब्दों से रह जाता है सदा के लिए अलगाव।  पल भर का सुख यह  ज़रूर देता है , लेकिन हम को हम ही से दूर कर देता है।  बना देता है इंसान को यह  असहाय , करना ज़रूरी हो जाता है फिर इसका उपाय।  वो भाग्यशाली है, जो यह  जान पाए , की गुस्सा हमें है कमज़ो...

दशा मन की

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मन के ये इतने उतार चढ़ाव , ज़िंदगी का है ये कैसा पड़ाव।  रास्ता यह है रोमांच से भरा , कभी सूखा, तो है कभी हरा।  पनप रहे हैं कुछ अलग ही विचार , जैसे खड़ा हो कोई बीच बाज़ार।  हर विचार ने बनायी है अपनी दुकान , अब कैसे करूं मैं, इन  सबका बखान।  पल-पल बदलते मेरे मन के ये भाव , डालते मुझ पर, बार-बार प्रभाव।  ऊर्जाओं ने मुझे ऐसे है घेरा, मानो, अँधेरे से निकलने को छटपटा रहा हो सवेरा।  क्यों विचलित हो जाता है मन मेरा, जब ज़िन्दगी है केवल इक रैन बसेरा।  फिर भी है मन में छुपी आशा , जो बदल देती है यूँ मेरी भाषा।  कराती है मुझे बार-बार यह एहसास , कि, करते रहना है मुझे बस निरंतर प्रयास।  यह तो हो रही है सुबह के लिए तैयारी , ज़िंदगी खिलाएगी जल्द ही, एक नयी पारी।  हार जीत तो है मात्र एक भ्रम , इनसे तो बहुत कुछ सीखते हैं हम।  मन की स्थिति बदलने में समय नहीं लगेगा, वो नया सूरज फिर कुछ कहेगा।  बदलेंगे फिर मेरे मन के भाव, और ले आएँगे जीवन में थोड़ा ठहराव।...

माया

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सब प्रभु की माया है  कहीं धूप, कहीं छाया है  प्रभु सभी में समाया है  फिर भी कहीं धूप कहीं छाया है  यही तो प्रभु की माया है  जो मनुष्य समझ नहीं पाया है  यह राग न जाने कितनों ने गाया है  और संसार को बार-बार बताया है  अपना पराया तो केवल ऊपरी काया है  ईश्वर ही तो एक मात्र सरमाया है  फिर किस बात का भय सताया है  जब ईश्वर अपना हमसाया है  ये रिश्ता उसने सदा ही निभाया है  पग-पग पे गिरने से बचाया है  मेरे मन ने क्यों ये सुझाया है  कदाचित यह मुझे भरमाया है  परंतु, जि सने विश्वास बनाया है   उसी  ने ईश्वर को पाया है    ये उसी ने तो निरंतर दिखाया है  और सदा हमसे जताया है कि  सब प्रभु की माया है  सब प्रभु की माया है।

अस्तित्व

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हाँ मैं हूँ....      दुनिया में हूँ....  इस मिट्टी के शरीर में , उस पत्थर की लक़ीर में , हर नई उमंग में , हर नई तरंग में , हूँ.. मैं हूँ....  दुआ की उस ताकत में , जज़्बे की उस हिमाक़त में , उस चहकती धूप में , उस दमकते रूप में , हूँ.. मैं हूँ....  इन बहकती हवाओं में , उन महकती घटाओं में , रात के उस अँधेरे में , होने वाले सवेरे में , हूँ.. मैं हूँ....  दीया की उस बाती में , गाँवों की उस माटी में , समंदर की  गहराइयों में , पर्वतों की ऊंचाइयों में , हूँ.. मैं हूँ....  शेर की दहाड़ में , सांप की फूँकार में , चिड़िया की चहचहाट में , मक्खी की भिनभिनाहट में , हूँ.. मैं हूँ....  उन पेड़ों की डाली में , उन्हें सींचते माली में , ख़ुशी में बजी उस ताली में , और गुस्से में निकली उस गाली में , हूँ.. मैं हूँ....  तेरी हँसी ठिठोली में , तेरी कड़वी बोली में , रंगों भरी होली में , माथे पे सजी रो...

क्यों हूँ मैं परेशान ?

    क्यों हूँ मैं परेशान ! कर देता है यह एहसास, बार-बार मुझे हैरान , क्यों लगने लगता है सब कुछ यूँ वीरान , क्या बनेगी मेरी पहचान ? दिल क्यों नहीं लेता यह मान , कि, व्यर्थ है मेरा यह बखान , न जाने कब होगा समाधान , और कब थमेगा ये तूफ़ान।  कैसे हो गए हैं जीवन के खेत खलिहान , मानो सब कुछ हो गया हो बेजान , फिर भी चाहत है पाने की खुला आसमान , जो सुना देगा मुझे एक मधुर गान।  इधर-उधर से बटोरती रहती हूँ मैं ज्ञान , और करती हूँ कुछ अलग ही अनुसंधान , फिर भी इस बात से हूँ में अब तक अनजान , कि क्यों हूँ मैं परेशान, आख़िर क्यों हूँ मैं परेशान।  

नदी सा जीवन

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    मुझे कुछ कहना है , नदी की तरह तेज़ बहना है, उम्मीद का बनाया मैंने गहना है , विश्वास से सजाकर उसे पहना है।  बाधाओं के पर्वतों को तोड़ते हुए , ग़म के पत्थरों से रुख मोड़ते हुए , सूरज की तपिश को सहना है , और बस आगे बढ़ते रहना है।  विचारों के खेत में , नये अनुभवों की रेत में , तराई की मिट्टी को भिगोना है , जिसमें, नए साहस के बीजों को पिरोना है।  जज़्बातों के उठते गुब्बार से , शांत मन के प्रभाव से , आत्मा को यूँ संजोना है , कि, प्रकृति के आनंद में खोना है।  आगे धीमी गति से बढ़ते हुए , फैले हुए अंदाज़ों को समेटते हुए , समंदर की गेहराइयों में एक होना है , फिर सदा के लिए, चैन से सोना है।

बदलता समय

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न जाने और कितनी मुश्किलों का डेरा आएगा, चहकती धूप के बाद, बार-बार अँधेरा आएगा। मन को फिर से यूँ उधेड़ा जाएगा, विचारों को फिर से यूँ खदेड़ा जाएगा।  संकटों का बादल घनेरा छाएगा, पर ज्यादा समय तक टिक ना पाएगा।  काली घनी रात के बाद फिर सवेरा आएगा, जो मेरे पॉंव, फिर से जमाएगा।  संयम-हौसला राह बताएगा, विश्वास उसपे आगे बढ़ाएगा।  क़ाबिलियत को बुलंदी पर पहुँचाएगा, क्यूँकि,समय अब मेरा आएगा।। 

मेरी आवाज़

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ज़िन्दगी तू क्यों इतनी परेशान है , करती बार-बार मुझे हैरान है।  न जाने कब बन गई है तू पहेली , मुझे तो लगता था कि, है तू मेरी सहेली।  कभी भी ले आती है आँखों में तू आँसू , ऐसे में कैसे मैं बार-बार यूँ  हँसु।  सिसकियाँ जब होने लगती हैं कम , ला कर दे देती है तू, फिर एक नया ग़म।  रोज़ एक नया दिन, रोज़ एक नया कर्म, कैसे समझ पाएँगे तेरा ये मर्म।  बढ़ते हैं आगे, जब मेरे ये कदम, वापस खींचने के लिए, क्यों लगाती है तू दम।  पता नहीं किसके दिल से निकली है दुआ, जो इन सब के बाद भी जज़्बा है मेरा अनछुआ। सांस मेरी जब तक चलती रहेगी, हिम्मत मुझे तब तक मिलती रहेगी। चाहे न मिले चैन, ना मिले सुकून, कम ना होगा अब मेरा ये जूनून।  तू लगा ले ऐड़ी छोटी का ज़ोर , मुझे मिल गया है एक ऐसा छोर।  जिसे पकड़ कर मैं चलूंगी आज, चाहे कुछ भी आये मेरे हाथ में काज।  अब छेड़  तू नयी धुन, या छेड़ तू नया साज़ , मेरे हौसले को मैं बनाऊँगी, सिर का ताज।  अब ना गिरा पाएगी, फिर तू मुझ पर गाज, क्यूंकी....  मुझे मि...