बेबसी
क्यों हो रही बेबसी है,
चेहरे की मुस्कराहट, कहाँ जा छुपी है।
ऐसी चुभन मन में बसी है,
मानो ज़िंदगी कहीं आ फसी है।
मन की दशा यह ताज़ी नहीं है,
और सुनने को कोई राज़ी नहीं है।
यह ज़िंदगी क्यों ऐसे थमी है ,
आँखों में मेरी अब भी नमी है।
तमन्ना नहीं सितारों की,
बस चाही कुछ ज़मीं है।
न जानू मैं की क्या सही है,
पर मेरी मंज़िल यह तो नहीं है।
यह तो रास्ते में निकलती हुई एक झाँकी है,
और मेरा मुक़ाम अभी बाकी है।
ऐ मंज़िल, कुछ तो बता तू और कितनी दूर है,
दिल कबसे मेरा यूँ मजबूर है।
अब बुला भी ले, और सहा नहीं जाता,
तुझसे दूर, अब मुझसे रहा नहीं जाता।
लगता है जैसे खुद को खो दिया है ,
न जाने कौन सा बीज बो दिया है।
इंतेज़ार नहीं मुझे फल का,
बस इतना बता दे की रास्ता क्या है कल का।
कुछ तो दे तुझ तक पहुँचने के निशान ,
सब कुछ लग रहा है मुझे अब वीरान।
कब से हिम्मत को जुटा कर रखा है ,
मन को मैंने यह समझा कर रखा है।
कि जल्द होगा यह पड़ाव भी पार,
और खुल जाएँगे तेरे बंद द्वार।
अब ज़्यादा न करवा तू इंतेज़ार ,
भेज मुझे कहीं से, कोई तो समाचार।
इस विचार से खुश हो उठता है मन मेरा ,
कि अब नज़दीक है वो खिलता सवेरा।
जब छेड़ देगी फिर तू नया साज़,
और निखर जाऐगा मेरा यह अंदाज़।
मिल जाऐगी फिर मुझे वो जगह ,
जो है मेरे यहाँ आने की वज़ह।
पूरा करने को वो काम अधूरा ,
तैयार हूँ करने को जीवन, समर्पित पूरा।
यह कर्म ही तो हैं जो मंज़िल तक आगे बढ़ा रहे हैं ,
काँटो पर चल कर भी मुस्कुराना सिखा रहे हैं।
अब ना ही मैं थकूं, ना अब मैं रूकूं,
वापस मिलने को है मुझे मेरा सुकून।
पहुँच कर मंज़िल पर भी कहाँ रुक पाना है ,
तब फिर से एक, नयी धुन को गुनगुनाना है।
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