क्यों हूँ मैं परेशान ?

   
क्यों हूँ मैं परेशान !
कर देता है यह एहसास, बार-बार मुझे हैरान ,
क्यों लगने लगता है सब कुछ यूँ वीरान ,
क्या बनेगी मेरी पहचान ?

दिल क्यों नहीं लेता यह मान ,
कि, व्यर्थ है मेरा यह बखान ,
न जाने कब होगा समाधान ,
और कब थमेगा ये तूफ़ान। 

कैसे हो गए हैं जीवन के खेत खलिहान ,
मानो सब कुछ हो गया हो बेजान ,
फिर भी चाहत है पाने की खुला आसमान ,
जो सुना देगा मुझे एक मधुर गान। 

इधर-उधर से बटोरती रहती हूँ मैं ज्ञान ,
और करती हूँ कुछ अलग ही अनुसंधान ,
फिर भी इस बात से हूँ में अब तक अनजान ,
कि क्यों हूँ मैं परेशान, आख़िर क्यों हूँ मैं परेशान।  

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