गुस्सा
गुस्सा भी अजीब चीज़ है ,
बहुत सी नकारात्मकताओं का बीज है।
बैठ जाता है ऐसे नाक पर ,
जैसे पक्षी कोई बैठा हो शाख पर ।
बार-बार दिमाग पर ज़ोर देता है ,
मन की शांति को निचोड़ लेता है।
कठोर बनाता है यह हमारी वाणी ,
और कभी-कभी ले आता है आँखों में पानी।
ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी इसको जताना ,
और मन की अवस्था को सामने दिखाना।
पर जब इससे इंसान होश खो देता है ,
तब अपने रिश्तों को दुःख में भिगो देता है।
चलाने लगता है फिर इंसान शब्दों के बाण ,
और बिखर कर रह जाता है, सारा मान सम्मान।
बिना सोचे समझे इंसान जो बोल देता है ,
सामने वाला उसे वैसे ही तोल लेता है।
यूँ तो समय भर देता है शरीर के घाव ,
पर शब्दों से रह जाता है सदा के लिए अलगाव।
पल भर का सुख यह ज़रूर देता है ,
लेकिन हम को हम ही से दूर कर देता है।
बना देता है इंसान को यह असहाय ,
करना ज़रूरी हो जाता है फिर इसका उपाय।
वो भाग्यशाली है, जो यह जान पाए ,
की गुस्सा हमें है कमज़ोर बनाये।
कुछ कहने से पहले मन को टटोल लेते हैं ,
यूँ अपने विचारों को हम बटोर लेते हैं।
ताकि न पहुँचा पाएं हम किसी को हानि ,
और ना हो बाद में फिर हमें ग्लानि।
बड़ा हितकारी होगा यह आत्ममंथन हमारा ,
जो ना करने देगा हमें , यूँ गुस्सा दोबारा।
चलो फिर एक सुविचार हो जाये ,
वरना, जाने कौन मासूम इसका शिकार हो जाए।

Wowwwww
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