दशा मन की
मन के ये इतने उतार चढ़ाव ,
ज़िंदगी का है ये कैसा पड़ाव।
रास्ता यह है रोमांच से भरा ,
कभी सूखा, तो है कभी हरा।
पनप रहे हैं कुछ अलग ही विचार ,
जैसे खड़ा हो कोई बीच बाज़ार।
हर विचार ने बनायी है अपनी दुकान ,
अब कैसे करूं मैं, इन सबका बखान।
पल-पल बदलते मेरे मन के ये भाव ,
डालते मुझ पर, बार-बार प्रभाव।
ऊर्जाओं ने मुझे ऐसे है घेरा,
मानो, अँधेरे से निकलने को छटपटा रहा हो सवेरा।
क्यों विचलित हो जाता है मन मेरा,
जब ज़िन्दगी है केवल इक रैन बसेरा।
फिर भी है मन में छुपी आशा ,
जो बदल देती है यूँ मेरी भाषा।
कराती है मुझे बार-बार यह एहसास ,
कि, करते रहना है मुझे बस निरंतर प्रयास।
यह तो हो रही है सुबह के लिए तैयारी ,
ज़िंदगी खिलाएगी जल्द ही, एक नयी पारी।
हार जीत तो है मात्र एक भ्रम ,
इनसे तो बहुत कुछ सीखते हैं हम।
मन की स्थिति बदलने में समय नहीं लगेगा,
वो नया सूरज फिर कुछ कहेगा।
बदलेंगे फिर मेरे मन के भाव,
और ले आएँगे जीवन में थोड़ा ठहराव।
मिट जाएगी फिर वो अनचाही भ्रांति ,
छू लेगी मेरे मन को, असीम शांति।
हर पल बस आनंद की अनुभूती होगी ,
मेरा विश्वास सदा, रहेगा मेरा सहयोगी।
तरंगों की छा जायेगी फिर वो नयी फुहार,
ले आएगी जीवन में सदा के लिए बहार।
चाहत नहीं पाने की खुला आसमां,
जब अपना ही है यह सारा समा।
पर जो नहीं कर पा रहें हैं अभी बयां ,
एक दिन, फिर से लिखेंगे हसीन दास्तां।

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