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यह दर्द भी चला जाएगा

इक दिन ऐसा आएगा ,  जब यह दर्द भी चला जाएगा . देकर ज़िंदगी की नयी सीख , यह मुझे और मजबूत बनाएगा. इक दिन ऐसा आएगा , जब यह दर्द भी चला जाएगा ... जीवन के कठिन रास्तों को भी , यह विश्वास के फूलों से सजाएगा . बैठा कर, खुशियों के आसान पर , यह, धीमे से झूला झुलाएगा . इक दिन ऐसा आएगा , जब यह दर्द भी चला जाएगा ... रात के इस अँधेरे में भी , मुझे, यह नयी दिशा दिखाएगा . तकलीफ की इस घड़ी में भी , यह सुकून का पता बताएगा . इक दिन ऐसा आएगा , जब यह दर्द भी चला जाएगा ... परेशानियां आएं लाख मगर , यह मुझे फिर से नहीं रुलाएगा . हार कर ज़िंदगी की बाज़ी भी , यह मुझे फिर से जीतना सिखाएगा . इक दिन ऐसा आएगा , जब यह दर्द भी चला जाएगा ... जब यह दर्द भी चला जाएगा ....

लाचारी

लाचारी तन से हो या मन से अंदर तक तोड़ देती है . दौड़ती हुई ज़िन्दगी को भी यह नयी दिशा में मोड़ देती है . बीमारी जब कोई आ जाती है जीने का नया तरीका सिखा जाती है . क्षण भर के लिए चूर कर देती है हर सपना साथ ही बता भी देती है, की कौन है तेरा यहाँ अपना . इसमें भी है ऊपर वाले की रज़ा जो ऐसे में भी देती है जीवन जीने का मज़ा . डर कर इससे नहीं रुक जाना है मंज़िल तक पहुंचने का, एक नया रास्ता अपनाना है .

मन की उदासी

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मन क्यों इस कदर उदास है , यह आदत है या, बात कुछ ख़ास है।  न जाने कैसा, अजीब सा एहसास है , और क्यों हो रहा यह आभास है।  नहीं आता मुझे कुछ भी रास है , अपना स्वभाव तो केवल मन का दास है।  क्या मुझसे दूर, क्या मेरे पास है , अपना हथियार तो केवल विश्वास है।  करता जब कोई निरंतर प्रयास है , बन जाता फिर वो काम, ख़ास है।  कैसा अनोखा यह जीवन का राज़ है , हर दिन ने छेड़ा एक नया साज़ है।  फिर भी मन में छुपी इक आस है , जो कहती है कि , डट कर चलना है जब तक इस शरीर में सांस है। 

बेबसी

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क्यों हो रही बेबसी है, चेहरे की मुस्कराहट, कहाँ जा छुपी है।  ऐसी चुभन मन में बसी है, मानो ज़िंदगी कहीं आ फसी है।  मन की दशा यह ताज़ी नहीं है, और सुनने को कोई राज़ी नहीं है।  यह ज़िंदगी क्यों ऐसे थमी है , आँखों में मेरी अब भी नमी है।  तमन्ना नहीं सितारों की, बस चाही कुछ ज़मीं है।  न जानू मैं की क्या सही है, पर मेरी मंज़िल यह तो नहीं है।  यह तो रास्ते में निकलती हुई एक झाँकी है, और मेरा मुक़ाम अभी बाकी है।  ऐ मंज़िल, कुछ तो बता तू और कितनी दूर है, दिल कबसे मेरा यूँ मजबूर है।  अब बुला भी ले, और सहा नहीं जाता, तुझसे दूर, अब मुझसे रहा नहीं जाता।  लगता है जैसे खुद को खो दिया है , न जाने कौन सा बीज बो दिया है।  इंतेज़ार नहीं मुझे फल का, बस इतना बता दे की रास्ता क्या है कल का।  कुछ तो दे तुझ तक पहुँचने के निशान , सब कुछ लग रहा है मुझे अब वीरान।  कब से हिम्मत को जुटा कर रखा है , मन को मैंने यह समझा कर रखा है।  कि  जल्द होगा यह पड़ाव भी पार, और खुल...

गुस्सा

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गुस्सा भी अजीब चीज़ है , बहुत सी नकारात्मकताओं का बीज है।   बैठ जाता है ऐसे नाक पर  , जैसे पक्षी कोई बैठा हो शाख पर ।  बार-बार दिमाग पर  ज़ोर देता है , मन की शांति को निचोड़ लेता है।  कठोर बनाता है यह हमारी वाणी , और कभी-कभी ले आता है आँखों में पानी। ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी इसको जताना , और मन की अवस्था को सामने दिखाना।  पर जब इससे इंसान होश खो देता है , तब अपने रिश्तों को दुःख में भिगो देता है।  चलाने लगता है फिर इंसान शब्दों के बाण , और बिखर कर रह जाता है, सारा मान सम्मान।  बिना सोचे समझे इंसान जो बोल देता है , सामने वाला उसे वैसे ही तोल लेता है।  यूँ तो समय भर देता है शरीर के घाव , पर शब्दों से रह जाता है सदा के लिए अलगाव।  पल भर का सुख यह  ज़रूर देता है , लेकिन हम को हम ही से दूर कर देता है।  बना देता है इंसान को यह  असहाय , करना ज़रूरी हो जाता है फिर इसका उपाय।  वो भाग्यशाली है, जो यह  जान पाए , की गुस्सा हमें है कमज़ो...

दशा मन की

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मन के ये इतने उतार चढ़ाव , ज़िंदगी का है ये कैसा पड़ाव।  रास्ता यह है रोमांच से भरा , कभी सूखा, तो है कभी हरा।  पनप रहे हैं कुछ अलग ही विचार , जैसे खड़ा हो कोई बीच बाज़ार।  हर विचार ने बनायी है अपनी दुकान , अब कैसे करूं मैं, इन  सबका बखान।  पल-पल बदलते मेरे मन के ये भाव , डालते मुझ पर, बार-बार प्रभाव।  ऊर्जाओं ने मुझे ऐसे है घेरा, मानो, अँधेरे से निकलने को छटपटा रहा हो सवेरा।  क्यों विचलित हो जाता है मन मेरा, जब ज़िन्दगी है केवल इक रैन बसेरा।  फिर भी है मन में छुपी आशा , जो बदल देती है यूँ मेरी भाषा।  कराती है मुझे बार-बार यह एहसास , कि, करते रहना है मुझे बस निरंतर प्रयास।  यह तो हो रही है सुबह के लिए तैयारी , ज़िंदगी खिलाएगी जल्द ही, एक नयी पारी।  हार जीत तो है मात्र एक भ्रम , इनसे तो बहुत कुछ सीखते हैं हम।  मन की स्थिति बदलने में समय नहीं लगेगा, वो नया सूरज फिर कुछ कहेगा।  बदलेंगे फिर मेरे मन के भाव, और ले आएँगे जीवन में थोड़ा ठहराव।...

माया

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सब प्रभु की माया है  कहीं धूप, कहीं छाया है  प्रभु सभी में समाया है  फिर भी कहीं धूप कहीं छाया है  यही तो प्रभु की माया है  जो मनुष्य समझ नहीं पाया है  यह राग न जाने कितनों ने गाया है  और संसार को बार-बार बताया है  अपना पराया तो केवल ऊपरी काया है  ईश्वर ही तो एक मात्र सरमाया है  फिर किस बात का भय सताया है  जब ईश्वर अपना हमसाया है  ये रिश्ता उसने सदा ही निभाया है  पग-पग पे गिरने से बचाया है  मेरे मन ने क्यों ये सुझाया है  कदाचित यह मुझे भरमाया है  परंतु, जि सने विश्वास बनाया है   उसी  ने ईश्वर को पाया है    ये उसी ने तो निरंतर दिखाया है  और सदा हमसे जताया है कि  सब प्रभु की माया है  सब प्रभु की माया है।