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Showing posts from July, 2019

अस्तित्व

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हाँ मैं हूँ....      दुनिया में हूँ....  इस मिट्टी के शरीर में , उस पत्थर की लक़ीर में , हर नई उमंग में , हर नई तरंग में , हूँ.. मैं हूँ....  दुआ की उस ताकत में , जज़्बे की उस हिमाक़त में , उस चहकती धूप में , उस दमकते रूप में , हूँ.. मैं हूँ....  इन बहकती हवाओं में , उन महकती घटाओं में , रात के उस अँधेरे में , होने वाले सवेरे में , हूँ.. मैं हूँ....  दीया की उस बाती में , गाँवों की उस माटी में , समंदर की  गहराइयों में , पर्वतों की ऊंचाइयों में , हूँ.. मैं हूँ....  शेर की दहाड़ में , सांप की फूँकार में , चिड़िया की चहचहाट में , मक्खी की भिनभिनाहट में , हूँ.. मैं हूँ....  उन पेड़ों की डाली में , उन्हें सींचते माली में , ख़ुशी में बजी उस ताली में , और गुस्से में निकली उस गाली में , हूँ.. मैं हूँ....  तेरी हँसी ठिठोली में , तेरी कड़वी बोली में , रंगों भरी होली में , माथे पे सजी रो...

क्यों हूँ मैं परेशान ?

    क्यों हूँ मैं परेशान ! कर देता है यह एहसास, बार-बार मुझे हैरान , क्यों लगने लगता है सब कुछ यूँ वीरान , क्या बनेगी मेरी पहचान ? दिल क्यों नहीं लेता यह मान , कि, व्यर्थ है मेरा यह बखान , न जाने कब होगा समाधान , और कब थमेगा ये तूफ़ान।  कैसे हो गए हैं जीवन के खेत खलिहान , मानो सब कुछ हो गया हो बेजान , फिर भी चाहत है पाने की खुला आसमान , जो सुना देगा मुझे एक मधुर गान।  इधर-उधर से बटोरती रहती हूँ मैं ज्ञान , और करती हूँ कुछ अलग ही अनुसंधान , फिर भी इस बात से हूँ में अब तक अनजान , कि क्यों हूँ मैं परेशान, आख़िर क्यों हूँ मैं परेशान।  

नदी सा जीवन

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    मुझे कुछ कहना है , नदी की तरह तेज़ बहना है, उम्मीद का बनाया मैंने गहना है , विश्वास से सजाकर उसे पहना है।  बाधाओं के पर्वतों को तोड़ते हुए , ग़म के पत्थरों से रुख मोड़ते हुए , सूरज की तपिश को सहना है , और बस आगे बढ़ते रहना है।  विचारों के खेत में , नये अनुभवों की रेत में , तराई की मिट्टी को भिगोना है , जिसमें, नए साहस के बीजों को पिरोना है।  जज़्बातों के उठते गुब्बार से , शांत मन के प्रभाव से , आत्मा को यूँ संजोना है , कि, प्रकृति के आनंद में खोना है।  आगे धीमी गति से बढ़ते हुए , फैले हुए अंदाज़ों को समेटते हुए , समंदर की गेहराइयों में एक होना है , फिर सदा के लिए, चैन से सोना है।

बदलता समय

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न जाने और कितनी मुश्किलों का डेरा आएगा, चहकती धूप के बाद, बार-बार अँधेरा आएगा। मन को फिर से यूँ उधेड़ा जाएगा, विचारों को फिर से यूँ खदेड़ा जाएगा।  संकटों का बादल घनेरा छाएगा, पर ज्यादा समय तक टिक ना पाएगा।  काली घनी रात के बाद फिर सवेरा आएगा, जो मेरे पॉंव, फिर से जमाएगा।  संयम-हौसला राह बताएगा, विश्वास उसपे आगे बढ़ाएगा।  क़ाबिलियत को बुलंदी पर पहुँचाएगा, क्यूँकि,समय अब मेरा आएगा।। 

मेरी आवाज़

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ज़िन्दगी तू क्यों इतनी परेशान है , करती बार-बार मुझे हैरान है।  न जाने कब बन गई है तू पहेली , मुझे तो लगता था कि, है तू मेरी सहेली।  कभी भी ले आती है आँखों में तू आँसू , ऐसे में कैसे मैं बार-बार यूँ  हँसु।  सिसकियाँ जब होने लगती हैं कम , ला कर दे देती है तू, फिर एक नया ग़म।  रोज़ एक नया दिन, रोज़ एक नया कर्म, कैसे समझ पाएँगे तेरा ये मर्म।  बढ़ते हैं आगे, जब मेरे ये कदम, वापस खींचने के लिए, क्यों लगाती है तू दम।  पता नहीं किसके दिल से निकली है दुआ, जो इन सब के बाद भी जज़्बा है मेरा अनछुआ। सांस मेरी जब तक चलती रहेगी, हिम्मत मुझे तब तक मिलती रहेगी। चाहे न मिले चैन, ना मिले सुकून, कम ना होगा अब मेरा ये जूनून।  तू लगा ले ऐड़ी छोटी का ज़ोर , मुझे मिल गया है एक ऐसा छोर।  जिसे पकड़ कर मैं चलूंगी आज, चाहे कुछ भी आये मेरे हाथ में काज।  अब छेड़  तू नयी धुन, या छेड़ तू नया साज़ , मेरे हौसले को मैं बनाऊँगी, सिर का ताज।  अब ना गिरा पाएगी, फिर तू मुझ पर गाज, क्यूंकी....  मुझे मि...