अस्तित्व
हाँ मैं हूँ.... दुनिया में हूँ.... इस मिट्टी के शरीर में , उस पत्थर की लक़ीर में , हर नई उमंग में , हर नई तरंग में , हूँ.. मैं हूँ.... दुआ की उस ताकत में , जज़्बे की उस हिमाक़त में , उस चहकती धूप में , उस दमकते रूप में , हूँ.. मैं हूँ.... इन बहकती हवाओं में , उन महकती घटाओं में , रात के उस अँधेरे में , होने वाले सवेरे में , हूँ.. मैं हूँ.... दीया की उस बाती में , गाँवों की उस माटी में , समंदर की गहराइयों में , पर्वतों की ऊंचाइयों में , हूँ.. मैं हूँ.... शेर की दहाड़ में , सांप की फूँकार में , चिड़िया की चहचहाट में , मक्खी की भिनभिनाहट में , हूँ.. मैं हूँ.... उन पेड़ों की डाली में , उन्हें सींचते माली में , ख़ुशी में बजी उस ताली में , और गुस्से में निकली उस गाली में , हूँ.. मैं हूँ.... तेरी हँसी ठिठोली में , तेरी कड़वी बोली में , रंगों भरी होली में , माथे पे सजी रो...