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Showing posts from December, 2019

मन की उदासी

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मन क्यों इस कदर उदास है , यह आदत है या, बात कुछ ख़ास है।  न जाने कैसा, अजीब सा एहसास है , और क्यों हो रहा यह आभास है।  नहीं आता मुझे कुछ भी रास है , अपना स्वभाव तो केवल मन का दास है।  क्या मुझसे दूर, क्या मेरे पास है , अपना हथियार तो केवल विश्वास है।  करता जब कोई निरंतर प्रयास है , बन जाता फिर वो काम, ख़ास है।  कैसा अनोखा यह जीवन का राज़ है , हर दिन ने छेड़ा एक नया साज़ है।  फिर भी मन में छुपी इक आस है , जो कहती है कि , डट कर चलना है जब तक इस शरीर में सांस है। 

बेबसी

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क्यों हो रही बेबसी है, चेहरे की मुस्कराहट, कहाँ जा छुपी है।  ऐसी चुभन मन में बसी है, मानो ज़िंदगी कहीं आ फसी है।  मन की दशा यह ताज़ी नहीं है, और सुनने को कोई राज़ी नहीं है।  यह ज़िंदगी क्यों ऐसे थमी है , आँखों में मेरी अब भी नमी है।  तमन्ना नहीं सितारों की, बस चाही कुछ ज़मीं है।  न जानू मैं की क्या सही है, पर मेरी मंज़िल यह तो नहीं है।  यह तो रास्ते में निकलती हुई एक झाँकी है, और मेरा मुक़ाम अभी बाकी है।  ऐ मंज़िल, कुछ तो बता तू और कितनी दूर है, दिल कबसे मेरा यूँ मजबूर है।  अब बुला भी ले, और सहा नहीं जाता, तुझसे दूर, अब मुझसे रहा नहीं जाता।  लगता है जैसे खुद को खो दिया है , न जाने कौन सा बीज बो दिया है।  इंतेज़ार नहीं मुझे फल का, बस इतना बता दे की रास्ता क्या है कल का।  कुछ तो दे तुझ तक पहुँचने के निशान , सब कुछ लग रहा है मुझे अब वीरान।  कब से हिम्मत को जुटा कर रखा है , मन को मैंने यह समझा कर रखा है।  कि  जल्द होगा यह पड़ाव भी पार, और खुल...