गुस्सा
गुस्सा भी अजीब चीज़ है , बहुत सी नकारात्मकताओं का बीज है। बैठ जाता है ऐसे नाक पर , जैसे पक्षी कोई बैठा हो शाख पर । बार-बार दिमाग पर ज़ोर देता है , मन की शांति को निचोड़ लेता है। कठोर बनाता है यह हमारी वाणी , और कभी-कभी ले आता है आँखों में पानी। ज़रूरी हो जाता है कभी-कभी इसको जताना , और मन की अवस्था को सामने दिखाना। पर जब इससे इंसान होश खो देता है , तब अपने रिश्तों को दुःख में भिगो देता है। चलाने लगता है फिर इंसान शब्दों के बाण , और बिखर कर रह जाता है, सारा मान सम्मान। बिना सोचे समझे इंसान जो बोल देता है , सामने वाला उसे वैसे ही तोल लेता है। यूँ तो समय भर देता है शरीर के घाव , पर शब्दों से रह जाता है सदा के लिए अलगाव। पल भर का सुख यह ज़रूर देता है , लेकिन हम को हम ही से दूर कर देता है। बना देता है इंसान को यह असहाय , करना ज़रूरी हो जाता है फिर इसका उपाय। वो भाग्यशाली है, जो यह जान पाए , की गुस्सा हमें है कमज़ो...