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माया

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सब प्रभु की माया है  कहीं धूप, कहीं छाया है  प्रभु सभी में समाया है  फिर भी कहीं धूप कहीं छाया है  यही तो प्रभु की माया है  जो मनुष्य समझ नहीं पाया है  यह राग न जाने कितनों ने गाया है  और संसार को बार-बार बताया है  अपना पराया तो केवल ऊपरी काया है  ईश्वर ही तो एक मात्र सरमाया है  फिर किस बात का भय सताया है  जब ईश्वर अपना हमसाया है  ये रिश्ता उसने सदा ही निभाया है  पग-पग पे गिरने से बचाया है  मेरे मन ने क्यों ये सुझाया है  कदाचित यह मुझे भरमाया है  परंतु, जि सने विश्वास बनाया है   उसी  ने ईश्वर को पाया है    ये उसी ने तो निरंतर दिखाया है  और सदा हमसे जताया है कि  सब प्रभु की माया है  सब प्रभु की माया है।